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उत्तराखंड संस्कृति

झूमा देवी के मंदिर में लगता है नि:संतान दंपतियों का तांता, भर जाते हैं सूनी गोद

उत्तराखण्ड में माँ के कई मंदिर है . इन मंदिरों की अपने आप में लग ही आस्था है वही माँ भगवती को समर्पित यह मंदिर कुमाऊँ मंडल के चम्पावत जिले के उत्तर में स्थित सुई-बिसुंग पट्टी के बीच में लोहाघाट से लगभग 8 किलोमीटर पर लगभग 6957 फ़ीट ऊँचा पर्वत शिखर है जिसका नाम झूमादेवी है।

  • माँ झूमाधुरी निसंतान महिलाओं की गोद भरने वाली देवी के रूप में पूजी जाती है। कहते हैं माँ झूमाधुरी माता निसंतान महिलाओं की प्रार्थना सुनती हैं और उन्हें संतान सुख देती हैं। कहते हैं इस पर्वत पर माता का निवास युगों से है। जनश्रुतियों के अनुसार एक बार माता ने नेपाल के एक निसंतान पति पत्नी ने माता के स्वप्न निर्देशनुसार यहाँ पर माता के मंदिर की स्थापना की और माँ ने उन्हें संतान सुख दिया था। एक अन्य लोककथानुसार चम्पावत के एक प्रसिद्ध राजमिस्त्री को माँ ने रथ का निर्माण करने और मेला आयोजन करने को स्वप्न निर्देश दिया था।

सैकड़ों वर्षों से यहाँ प्रत्येक वर्ष नंदाष्टमी के दिन यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है। यहाँ निःसंतान महिलाएं रात भर माँ झुमदेवी का जागरण करती हैं। दूसरे दिन गांव से रथों पर सवार माँ के देव डांगरों को लोग खड़ी चढ़ाई में  रस्सियों के सहारे खींच कर झूमाधुरी मंदिर तक पहुंचाते हैं। ग्राम सभा पाटन गांव के पालदेवी से तथा राइकोट महर गांव से निकलते हैं दो रथ। बताया जाता है कि संतान प्राप्ति के लिए रात भर जागरण कर रही महिलायें इन रथों के नीचे से गुजरती हैं। और पुरुष लम्बी -लम्बी रस्सियों से रथों को खींचते हैं। विशाल जनसैलाब माँ के जयकारों से पूरा वातावरण गुंजायमान होता रहता है। और देव डांगरों के शरीर में अवतरित माँ रथ में से चवरऔर अक्षतों  से अपने भक्तों को आशीष देती हैं। यहाँ चैत्र नवरात्री में भी विशेष उत्सव आयोजित किए जाते हैं।

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Monika

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