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उत्तराखंड संस्कृति

उत्तराखंंड की यह देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर

उत्तराखंंड की ये देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर
उत्तराखंंड की ये देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर

उत्तराखंड को देवभूमि के नाम से जाना जाता है, क्योंकि यहां पतित पावन गंगा की धार है, यहां साधु संत ध्यान के लिए आते हैं, और उत्तराखंड में हिमालय की गोद में चार मोती हैं। जिन्हें भारत का छोटा चार धाम कहा जाता है। उत्तराखंड में  हिंदुओं के चार पवित्र धाम शामिल हैं। केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री। इन चारों यात्राओं का ही हमारे हिन्दु धर्म मे बहुत महत्व है।यहां भगवान शिव और विष्णु जी के पूजा स्थल हैं। पंच बद्री, पंच केदार, पंच प्रयाग तीर्थ उत्तराखंड में ही है।वही आज हम आपको सिद्धपीठ मां ज्वालपा देवी के बारे में बताने जा रहे है।

उत्तराखंंड की ये देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर
उत्तराखंंड की ये देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर
उत्तराखंंड की ये देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर
उत्तराखंंड की ये देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर

 

कहां है मां ज्वालपा देवी मंदिर

उत्तराखंड के पौड़‌ी गढ़वाल स्थित पौड़ी-कोटद्वार मार्ग पर नयार नदी के तट पर स्थित देवी दुर्गा को समर्पित इस क्षेत्र का प्रसिद्ध शक्तिपीठ माँ ज्वाल्पा देवी का मंदिर यहा मंदिर पौड़ी-कोटद्वार मोटर सड़क पर पौड़ी से लगभग 33 किमी दूरी पर स्थित है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार

पौराणिक कथाओं के अनुसार,सतयुग में दैत्यराज पुलोम की पुत्री शची ने देवराज इंद्र को पति रूप में पाने के लिए नयार नदी के किनारे ज्वाल्पा धाम में जगत माता देवी मां पार्वती की तपस्या की थी। मां पार्वती ने शची की तपस्या से काफी प्रसन्न हुई जिसके बाद उसे दीप्त ज्वालेश्वरी के रूप में दर्शन देते हुए उसकी मनोकामना पूर्ण की,और साथ ही मां शची को ये वरदान दिया की जो भी इस धाम में सच्चे मन से वर की कामना लेकर आऐगा उसकी हर मनोकामना पूरी होगी,इसी के साथ मां के ज्वाला रूप में दर्शन देने के कारण इस स्थान का नाम ज्वालपा पड़ा गया।

उत्तराखंंड की ये देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर
उत्तराखंंड की ये देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर

मां पार्वती के दीप्तिमान ज्वाला। के रूप में प्रकट होने के प्रतीक स्वरूप अखंड दीपक निरंतर मंदिर में प्रज्ज्वलित रहता है। इस प्रथा को यथावत रखने के लिए प्राचीन काल से निकटवर्ती मवालस्यूं, कफोलस्यूं, खातस्यूं, रिंगवाडस्यूं, घुड़दौड़स्यूं और गुराडस्यूं पट्टयों के गांवों से सरसों को एकत्रित कर मां के अखंड दीपकको प्रज्ज्वलित रखने के लिए तेल की व्यवस्था की जाती है।

आप को बता दे की 18वीं शताब्दी में गढ़वाल के राजा प्रद्युम्न शाह ने मंदिर को 11.82 एकड़ सिंचित भूमि दान की थी। ताकि यहां अखंड दीपक हेतु तेल की व्यवस्था के लिए सरसों का उत्पादन हो सके। माना जाता है  कि आदि गुरु शंकराचार्य ने यहां मां की पूजा अर्चना की थी, जिसके बाद मां पर्वती ने उन्हें दर्शन दिए थे।
ज्वाल्पा देवी सिद्ध पीठ पौराणिक महत्व को समेटे हुए है। इस पीठ के बारे में प्रसिद्ध है कि यहां आने पर हर मनोकामना पूर्ण होती है और खासकर कुंवारी लड़कियों की वर की इच्छा पूरी होती है।
उत्तराखंंड की ये देवी देती है मनचाहा वर,यहां स्थित है मां का सिद्धपीठ मंदिर
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